Friday, 14 May 2010

यादों का समंदर


मैंने संचित किये हैं ...
यादों के समंदर से कुछ मोती

पिरोये हैं समय की माला में
जपती रहती हूँ ..
जागते रहने पर
या रहती हूँ सोती |

किसी मोती पर आ के
रुक जाती है अंगुली
मैं खो जाती हूँ
कभी अकारण हंसती हूँ ...और कभी रहती हूँ रोती
मैंने संचित किये हैं ... यादों के समंदर से कुछ मोती

1 comment:

शोभना चौरे said...

कभी अकारण हंसती हूँ ...और कभी रहती हूँ रोती
मैंने संचित किये हैं ... यादों के समंदर से कुछ मोती

bahut khoobsoorat hai yado ke moti .