Wednesday, 1 September 2010

इस जीवन के साज़ को मौन नहीं आवाज़ दो
थम लेंगे बांह तुम्हारी
थोडा सा विश्वास दो
आस निराश का ताना -बना
कभी सुगम कभी पथ अनजाना
कदमो को थोडा सा मंज़िल का
एहसास दो
सहज-सरल है जीवन अपना
सच होगा देखा जो सपना
बुझी आंच को ऊष्मा का एहसास दो

Friday, 14 May 2010

अच्छा नहीं लगता

ये आंसुओं की सौगात मुझे दे दो
तुम्हारी आंखे नम हो ये मुझे अच्छा नहीं लगता
तुम अपने सारे ग़म सुना दो ना मुझको
तुम्हारी पेशानी पे ये बल मुझे अच्छा नहीं लगता
देखो होठो पे हंसी आई है ,उम्मीदों की नन्ही लहर छाई है
अब खुदा पे एतबार हो कम ये मुझे अच्छा नहीं लगता
जो लगाये थे बड़ी उम्मीद से
जो लगते थे मनमीत से
उन्ही दरख्तों उन यूँ काटना मुझे अच्छा नहीं लगता ||

तुम और मैं

तुम वट-वृक्ष ..मैं लता
तुम पवन मैं पताका

तुम सूर्य मैं रोशनी
तुम चाँद में चांदनी

तुम दीपक मैं बाती
तुम राह मैं साथी

तुम बीज मैं खलिहान
तुम शंका मैं समाधान ॥

यादों का समंदर


मैंने संचित किये हैं ...
यादों के समंदर से कुछ मोती

पिरोये हैं समय की माला में
जपती रहती हूँ ..
जागते रहने पर
या रहती हूँ सोती |

किसी मोती पर आ के
रुक जाती है अंगुली
मैं खो जाती हूँ
कभी अकारण हंसती हूँ ...और कभी रहती हूँ रोती
मैंने संचित किये हैं ... यादों के समंदर से कुछ मोती

अकेलापन

यह कविता नव-युगल दंपत्ति के क्षणिक आवेश को देख कर लिखी...
वे शायद पति पत्नी के रिश्ते की गहरायी को अभी समझ नहीं पाए हैं ...
इन रिश्तो की शुरुवात थोड़ी कठिन है... पर आगे राह सरल है...


तुम्हे याद करते करते
अकेलेपन ने मुझे मुस्कराहट दी .. और कहा -
साथ रहोगे ... तो हँसोगे

तुहारी यादों ने अकेलेपन में
मुझे उदास किया ... और कहा -
साथ रहोगे तो ... कंधे पर सिर रख कर रो लोगे

तुहारी याद में मैंने कईं गीत गुनगुनाए
अकेलेपन ने कहा -
साथ रहोगे तो मुक्त होकर गाओगे

तुम्हे याद करते करते
ना सो पाए सारी रात
अकेलेपन ने कहा -
साथ रहोगे तो घोड़े बेच कर सो जाओगे ॥

Saturday, 23 January 2010

रिश्ते

रिश्ते कोई घास के पुले नही,
अंगारा मिला धुआं किया
और बुझ गये |

रिश्ते सूखे वृक्ष का मोटा डूंड है
आग पकड़ी ,प्रकाश दिया ..ऊर्जा दी,
धीरे धीरे अंत तक अंगार देते रहे
गर्माहट मिलती रही ॥

रिश्तो के रस्सी पर गांठ लगेगी
कोई बात नहीं
कोई न कोई खोल देगा

पर दुःख की बात तो यह है ... रस्सी भी तो छोटी हो जाएगी ||