कर्म बगिया में नज़र पड़ी एक सुरभित पुष्पों से आच्छादित वृक्ष पर
वायु प्रसारित करती रही गंध
अतीत में जाने पर स्मरण आया के ये तो वे पुष्प है जिनके बीज तो
मेरे माता -पिता ने ही मेरे लिए बोए थे
आशीर्वाद इन बीजो का नाम
ओर ये देखो लगाओ हाथ, कितने कोमल है ये पाट
ये वो बीज है जिन्हे मैने जाने अंजाने मे किसी की
वैचारिक या टन मान धन से मदद क़ी
उन्होने दिए थे ये''धर्म -दान के बीज ''
अब उगे ये
एक नन्ही बेल धीरे -धीरे बढ़ी
एक कर्म व्रक्ष पर चढ़ि
अरे इन्हे हाथ मत लगाना
ये पौधे ये पाट-ये पुष्प
विचित्र है बड़ी पीड़ा है इनके स्पर्श मे
ये पीड़ा कोई हर नही सकता
ना भागवत भजन ना कोई जतन
एक जानकार माली ने बताया-
साहब ये बीज आपने ही किसी -किसी को दिए थे
थोड़े आपके पाले मे भी गिरे थे
जानकार माली ने इसे'' कष्ट के बीज '' नाम देते हुए कहा-
कई प्रकार का होता हे ये पौधा साहब
ओर ये पेड़ मुझे ही नही
मेरी बगिया मे आने वेल
हर एक अतिथि को पसंद है
इस पर मीठी बोलती हे कोयल
कभी किसी डाली पे गाता हे तोता
ये ''सुवचन' बीज का व्रक्ष है
देखो डोर एक'' कुवचन ''बीज का भी व्रक्ष है
बिल्कुल ठूंठ खड़ा है
कोने मे अकेला पड़ा है
केवल कौवा परिवार अपने इष्ता मित्रो के
साथ आता है कार्काश धवानी मे गाता है
इस पेड़ को देखो
घाना-घाना शाखो -पाटो से भरा -भरा
हरकच चायादार
ये नीम का पेड़ है
जानकार माली इसे बड्डपन के बीज का पेड़ बताते हैं
Tuesday, 6 October 2009
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1 comment:
ममताजी
कविता बहुत ही सुन्दर भावः लिए हुए है |
मुझे तो इसमें जीवन का साक्षात् दर्शन हो रहे है \
बधाई स्वीकारे
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