बसंत का पवन
एक सुरभित पुष्प
उड़ा कर ले गया |
पुष्प को
धरा पर रख
अपलक निहारता रहा||
धरा प्रमुदित हुई |
इतराकर बोली -
आज मेरे भाग्य के क्या कहने
धन्यवाद् पवन ;मेरे सम्मान के लिए |
पवन मुस्कराया ;बोला ---
मै तो प्रेमदूत हूँ
ये स्नेहसिक्त
पुष्प तो उस वृक्ष ने भेजा है -
दूर इंगित करते
हुए पुष्प आच्छादित वृक्ष बताया
कहने लगा -
वो तो प्रशंसक है तुम्हारी सहनशीलता का
धरा के अधरों पर
मीठी मुस्कान छा गई
पवन ने अपनी बातो में
गति देते हुए कहा -
उसकी आसक्ति तो
तुम्हारी उर्वरा शक्ति पर भी है
उसने इन
पुष्पों के साथ अपने अंश भी भेजे है
धरा के प्रश्न करने से पहले वह फ़िर बोला -
वह जानता है कि -दुःख के समय तुम इन अंशो को
सूखे पत्तो में
छुपा लोगी और सुख का समय आते ही
प्रस्फुटित कर दोगी
उसका प्रेम लहरा उठेगा
Monday, 17 August 2009
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