बात करीब चालीस- बयालीस वर्ष पहले की है | हम जुनी इंदौर में रहते थे जब मै छोटी थी |तब मेरे बाबूजी जब भी बाहर जाते ,कभी भी खालीहाथ घर नही आते ;चाहे वे नोकरी के लिए जाते या मिलने -जुलने | कभी चना -परमल कभी गीली मूंगफली , कभी जवार मक्काकी धानी कभी और कभी फुटाने| मोसमी फल तो पक्का| कभी लड्डूलाल की नमकीन चना दाल या मिक्चर| हाँ ....एक बात और याद आती है, उन दिनों सायकल के हँडलपर सूप में शेवंती की लालगुलाब लगी आठाने वाली वेणी भी लगाने को मिलती |समय बीतता गया मेरे विवाह के बाद वो प्रायःमेरे बच्चो से मिलने आते , पर अब भी खालीहाथ कभी नही| ये सब और न जाने कितनी बाते याद ऐसे आई -की कल टी वी पर एक सज्जन 'घर में लक्ष्मी कैसे आए 'अपने विचार बता रहे थे ;एक महत्वपूर्ण टिप देते हुए कहा --घर का ' मुखिया बाहर से घर में खाली हाथ कभी न आए ;चाहे वो घर के आँगन में लगे पेड़ की पत्ती ही क्यो न हो '|आज बाबूजी तो नही हैं , पर उनके और बाई [माँ] के आशीर्वाद से पुरे परिवार पर लक्ष्मी के साथ-साथ सरस्वती की महती कृपा है |ये माता -पिताके लगाये वृक्ष है , सम्यानंतरसे हम फल पाते हैं| मेरी आँखे ठंडे आंसुओ की धारा से नमन करतीहै|
4 comments:
mamtaji
bhut khubsurt sansmaran .mere man ko bhiga kar diya .
ase sanskar hme sirf mata pita hi de skte hai .
badhai
maataa-pitaa ke liye jab bhi koi apna antarman gilaa kartaa he, mujhe lagtaa he ishvar he, ynhi he, jaroor he....///aour me uske saamne natmastak ho jataa hoo///
mamtaaji, aapki sansamaran,hamee appnee atit ki yaad dila gayee ,kamana ,mumbai,,,
mamta,
kya baat hai.....tumne yaado ke samander me duba diya....ab to kamoshi se BABUG ko yaad karte rahte hai......gre8
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