Saturday, 23 May 2009

आकांक्षा


बरसोगेना श्याम घटा बन कर
कर दोगेना धरा को तर
अंतरतक तर
मन की कोयलिया कुहुक उठेगी
जब घन बासुरिया बजेगी
गूंज उठेंगे मधुरिम स्वर
अन्तर तक तर

हरा दुशाला मै ओडउंगी जब
घन बिजुरिया चमकेगी
प्रिय देखो ना मैं जाऊँ डर
अन्तर तक तर

रवि किरने कुछ मद्धिम होगी
जब तुम नित घर आओगे
देखेगा वो छुप - छुप कर
अन्तर तक तर

4 comments:

शोभना चौरे said...

हरा दुशाला मै ओडउंगी जब
घन बिजुरिया चमकेगी
प्रिय देखो ना मैं जाऊँ डर
अन्तर तक तर

vah bhut khub
acha pryas hai .lkhte rhe .
shubhkamnaye.

शोभना चौरे said...

हरा दुशाला मै ओडउंगी जब
घन बिजुरिया चमकेगी
प्रिय देखो ना मैं जाऊँ डर
अन्तर तक तर

vah bhut khub
acha pryas hai .lkhte rhe .
shubhkamnaye.

Mamta Sharma said...

DHANYAWAD

अमिताभ श्रीवास्तव said...

pahli baar aapke blog par aaya, aour hindi ki shudhdhata ke darshan hue, achha laga,achhi likhti he aap/
badhai