चमेली ने वर्षा से कहा ...
सखी, बीते दिनों मैं बहुत परेशां रही
कैसे???
पहले सूर्य तपा, अति तपा
फिर आंधियां चली
ऐसे चली की मैं बिखर बिखर गई
मेरी भुजाएं कहलाने वाली शाखाओं ने मेरा साथ छोड़ दिया..
मैं मैं ना रही..पर मैं घबरायी नही
क्यूंकि मुझे मालूम था कि तुम आओगी
स्नेह सांत्वना कि कुछ बूँदें मुझ पर गिरोगी
मैं फिर माटी में रम जाउंगी
अपने अस्तित्व को पा लूँगी
खूब पुष्पित हो कर मह्कुंगी
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