Thursday, 4 June 2009

तुम आओ तो सही

मेरे घर के आँगन में जलता है स्नेह का दीपक
तुम आओ तो सही
मेरे घर के आँगन में संस्कारों की श्री वृंदा लहराती
तुम आओ तो सही
मेरे घर के आँगन में हर्ष की चमेली महकती
तुम आओ तो सही
मेरे घर के आँगन में भावनाओं की चिडिया चहकती
तुम आओ तो सही
मेरे घर के आँगन में , मैं बैठी बाट जोहती
तुम आओ तो सही ......................

Wednesday, 3 June 2009

लक्ष्मी - सरस्वती का आगमन

बात करीब चालीस- बयालीस वर्ष पहले की है | हम जुनी इंदौर में रहते थे जब मै छोटी थी |तब मेरे बाबूजी जब भी बाहर जाते ,कभी भी खालीहाथ घर नही आते ;चाहे वे नोकरी के लिए जाते या मिलने -जुलने | कभी चना -परमल कभी गीली मूंगफली , कभी जवार मक्काकी धानी कभी और कभी फुटाने| मोसमी फल तो पक्का| कभी लड्डूलाल की नमकीन चना दाल या मिक्चर| हाँ ....एक बात और याद आती है, उन दिनों सायकल के हँडलपर सूप में शेवंती की लालगुलाब लगी आठाने वाली वेणी भी लगाने को मिलती |समय बीतता गया मेरे विवाह के बाद वो प्रायःमेरे बच्चो से मिलने आते , पर अब भी खालीहाथ कभी नही| ये सब और न जाने कितनी बाते याद ऐसे आई -की कल टी वी पर एक सज्जन 'घर में लक्ष्मी कैसे आए 'अपने विचार बता रहे थे ;एक महत्वपूर्ण टिप देते हुए कहा --घर का ' मुखिया बाहर से घर में खाली हाथ कभी न आए ;चाहे वो घर के आँगन में लगे पेड़ की पत्ती ही क्यो न हो '|आज बाबूजी तो नही हैं , पर उनके और बाई [माँ] के आशीर्वाद से पुरे परिवार पर लक्ष्मी के साथ-साथ सरस्वती की महती कृपा है |ये माता -पिताके लगाये वृक्ष है , सम्यानंतरसे हम फल पाते हैं| मेरी आँखे ठंडे आंसुओ की धारा से नमन करतीहै|

Tuesday, 2 June 2009

पावस गीत

पावस -गीत
धानी रंग छाया -धानी रंग छाया
बरखा आई ;बूंदे लाइ
देखो मन हर्षाया --
धानीरंग छाया |

कागा के नीड़से देखो ;भागी कोयल ;मीठी बोली
चली गाय कीचड़में देखो ;
तुष्ट हो गई बगुला टोली
भँवरा गुनगुनाया
धानी रंग छाया |

हरी वसुधा हरा-हरा जग
गोरी नाचे चुनर पहन
रसिया देखो आनंदित है
शांत हो गई अंग अगन
मनवा झूमा गाया
धानी रंग छाया|

चीड़ देवदार नीम
अम्बुवा सागवान
अमलतास ,महुवा
पीपल भी नहाया
धानी रंग छाया |

Monday, 1 June 2009

विचार

आज भोर से ही आगये है वो ,
अब दिन भर मेरे साथ रहेंगे वो ,
वो कहते रहे -बैठो फुर्सत में कुछ मीठी बात करे |
छोटी -छोटी बातो का मनमोहक विस्तार करे |
अरे '। छोटे से एक विचार की कड़ी बन गई |
कविता की छोटी श्रंगारित लड़ी बन गई |

जो आकर चले गए


कभी आते हैं चले जाते हैं
कभी आ जाते हैं तो पीछा नही छोड़ते
कभी किसी से मिलते ही नही
मिल जाते हैं तो नया रंग लाते हैं
कभी आए ,मिले ही नही
फिर भी रह गए तो
नीरसता लाते हैं|

कभी आते ही जीवन तक बदल देते हैं
कभी कुछ क्षण में चले जाते हैं
कभी आजीवन साथ रह्रते हैं
कभी न्यूटन जैसी महानता दिला देते हैं
और कभी रावन जैसी बदनामी
कभी मीरा को कृष्णमय
और कभी कृष्ण को राधामय ||

कभी किसी और के पास हों और लेलें
तो कैकेयी बना देते हैं
कभी धर्म के साथ आए ,तो सति अनुसुइया की तरह गोद में बिठा लेते हैं
और कभी इनके रहते महाभारत का रचन
और कभी दसरथ के वचन |

दोस्त यह विचार भी गजब की देन हैं
कर्म करो ,आगे बढ़ो
यह संतों के बैन हैं|

Saturday, 23 May 2009

वैचारिक वन

विचारो का जंगल
कही हरीतिमा कंही बंजर|

वो देखो कोयल कूकी
हरी डाल देख, जो
कल तकथीसूखी |



वो देखो नाचा मोर
मन में उसके उठा
है शोर|

वो देखो चिडिया चहकी
घटा को देखा ;
फुदकी ;बहकी

वो देखो ;बगुला भगत
गायों के पैरो का कीचड़
उसका जगत |


वो देखो हिरन की शोखी
कैसा मदमस्त ,हिरनिया की देख
मदहोशी |

आकांक्षा


बरसोगेना श्याम घटा बन कर
कर दोगेना धरा को तर
अंतरतक तर
मन की कोयलिया कुहुक उठेगी
जब घन बासुरिया बजेगी
गूंज उठेंगे मधुरिम स्वर
अन्तर तक तर

हरा दुशाला मै ओडउंगी जब
घन बिजुरिया चमकेगी
प्रिय देखो ना मैं जाऊँ डर
अन्तर तक तर

रवि किरने कुछ मद्धिम होगी
जब तुम नित घर आओगे
देखेगा वो छुप - छुप कर
अन्तर तक तर