Tuesday, 6 October 2009

कर्म बगिया में नज़र पड़ी एक सुरभित पुष्पों से आच्छादित वृक्ष पर
वायु प्रसारित करती रही गंध
अतीत में जाने पर स्मरण आया के ये तो वे पुष्प है जिनके बीज तो
मेरे माता -पिता ने ही मेरे लिए बोए थे
आशीर्वाद इन बीजो का नाम

ओर ये देखो लगाओ हाथ, कितने कोमल है ये पाट
ये वो बीज है जिन्हे मैने जाने अंजाने मे किसी की
वैचारिक या टन मान धन से मदद क़ी
उन्होने दिए थे ये''धर्म -दान के बीज ''
अब उगे ये

एक नन्ही बेल धीरे -धीरे बढ़ी
एक कर्म व्रक्ष पर चढ़ि
अरे इन्हे हाथ मत लगाना
ये पौधे ये पाट-ये पुष्प
विचित्र है बड़ी पीड़ा है इनके स्पर्श मे
ये पीड़ा कोई हर नही सकता
ना भागवत भजन ना कोई जतन
एक जानकार माली ने बताया-
साहब ये बीज आपने ही किसी -किसी को दिए थे
थोड़े आपके पाले मे भी गिरे थे
जानकार माली ने इसे'' कष्ट के बीज '' नाम देते हुए कहा-
कई प्रकार का होता हे ये पौधा साहब
ओर ये पेड़ मुझे ही नही
मेरी बगिया मे आने वेल
हर एक अतिथि को पसंद है
इस पर मीठी बोलती हे कोयल
कभी किसी डाली पे गाता हे तोता
ये ''सुवचन' बीज का व्रक्ष है
देखो डोर एक'' कुवचन ''बीज का भी व्रक्ष है
बिल्कुल ठूंठ खड़ा है
कोने मे अकेला पड़ा है
केवल कौवा परिवार अपने इष्ता मित्रो के
साथ आता है कार्काश धवानी मे गाता है

इस पेड़ को देखो
घाना-घाना शाखो -पाटो से भरा -भरा
हरकच चायादार
ये नीम का पेड़ है
जानकार माली इसे बड्डपन के बीज का पेड़ बताते हैं

Monday, 17 August 2009

स्नेहांश

बसंत का पवन
एक सुरभित पुष्प
उड़ा कर ले गया |

पुष्प को
धरा पर रख
अपलक निहारता रहा||
धरा प्रमुदित हुई |
इतराकर बोली -
आज मेरे भाग्य के क्या कहने
धन्यवाद् पवन ;मेरे सम्मान के लिए |
पवन मुस्कराया ;बोला ---
मै तो प्रेमदूत हूँ
ये स्नेहसिक्त
पुष्प तो उस वृक्ष ने भेजा है -
दूर इंगित करते
हुए पुष्प आच्छादित वृक्ष बताया
कहने लगा -
वो तो प्रशंसक है तुम्हारी सहनशीलता का
धरा के अधरों पर
मीठी मुस्कान छा गई
पवन ने अपनी बातो में
गति देते हुए कहा -
उसकी आसक्ति तो
तुम्हारी उर्वरा शक्ति पर भी है
उसने इन
पुष्पों के साथ अपने अंश भी भेजे है
धरा के प्रश्न करने से पहले वह फ़िर बोला -
वह जानता है कि -दुःख के समय तुम इन अंशो को
सूखे पत्तो में
छुपा लोगी और सुख का समय आते ही
प्रस्फुटित कर दोगी
उसका प्रेम लहरा उठेगा

Thursday, 6 August 2009

विनती


भगवान सदा मेरे साथ रहना
मेरे अन्तर मन में रमा करना
मेरे अन्तर मन में बसा करना |भगवान|









करुनाकर
मुझ पर कृपा करो
दयानिधि मुझ पर दया करो
चरणों में रहे मस्तक मेरा
प्रभु ये आशीष दिया करना |भगवान|

प्रभु तेरी दया का अंत नही
प्रभु तेरे बिन जीवन ही नही
करुना का दीप मेरे मन में प्रभु
सदा प्रदीप्त रखे रखना |भगवान|

मालवी बधाई











जनम्या
राम आनंद भयो मन में||
राजा दशरथजी ने घोडा पठाया
वोई घोडा हो सुरिजनारायण का रथ में |जनम्या |
राजा दशरथजी ने मोती पठाया
वोई मोती हो कोशल्या की नथ में |जनम्या |
राजा दशरथजी ने सालू पठाया
वोई सालू हो कोशल्या का अंग में |जनम्या |

Monday, 8 June 2009

विश्वास की पराकाष्ठा



संभावनाओ के आकाश से गिरी बूंदों ने
विश्वास के बीजो को पौधा बनने में मदद की |
और जब उन्हें माटी का अपनत्व मिला ;
वे वृक्ष बन गए ||
धीरे -धीरे उन् सघन वृक्षों पर पक्षियों ने अपना नीड़ बनाने की कोशिश की
अथक प्रयत्न i ;तिनका -तिनका जोड़ा ;आश्रय बन गए
शाखा -शाखा पर पंछी ही पंछी|
शाम सवेरे पक्षियों के कलरव से वातावरण रमणीय हो गया |
वे गाते एकता ;अखंडता ;भाईचारे का मंगल गान |
पर मानव से नही देखा गया वो एकता ;अखंडता और विश्वास का गान |
उसने भी इसे खत्म करने में लगा दी जी -जान |
''वृक्ष विश्वास की पराकाष्ठा थे कटे नही ''|
मनुष्य विज्ञानं के महत्व को जानता था' ''थके नही '
आरीऔर बड़ी होती गई
अंत में मानव ही जीता
पर पंछी भी हारेनही
वे पंक्ति बद्ध हो कर नील गगन में, उड़ चले ,
कर्मके सहारे नवीन नीडकी तलाश में |
पर जाते -जाते वे कहते गए
----वाह रे मानव वाह
तुम से तुम्हारा जब घर छिना जाएगा
तब हमारी याद आएगी
हम तो सब एक है;एक साथ है ;एक बार और तिनके जोड़ लेंगे
लेकिन तुम लोगो में वो एकता वो प्रेम वो भाईचारा है ही नही जो तुम एक साथ रह सको|
पंछी उड़ते गए ........................

Sunday, 7 June 2009

मेरी अर्जी



दाता
--
धूप दे या छाँव दे,
पथ दे या ठांव दे ,
राहत दे या घाव दे,
मुक्ति दे या तनाव दे,
तेरी मर्ज़ी दाता , ये मेरी अर्जी |

तट दे या बहाव दे,
शीत दे या अलाव दे,
रोक दे या घुमाव दे ,
लगाव दे या अलगाव दे
तेरी मर्ज़ी दाता , ये मेरी अर्जी |
(इमेज सोर्स- कोप्तिच्चुर्च .ओआरजी)

Thursday, 4 June 2009

तुम आओ तो सही

मेरे घर के आँगन में जलता है स्नेह का दीपक
तुम आओ तो सही
मेरे घर के आँगन में संस्कारों की श्री वृंदा लहराती
तुम आओ तो सही
मेरे घर के आँगन में हर्ष की चमेली महकती
तुम आओ तो सही
मेरे घर के आँगन में भावनाओं की चिडिया चहकती
तुम आओ तो सही
मेरे घर के आँगन में , मैं बैठी बाट जोहती
तुम आओ तो सही ......................