Monday, 8 June 2009

विश्वास की पराकाष्ठा



संभावनाओ के आकाश से गिरी बूंदों ने
विश्वास के बीजो को पौधा बनने में मदद की |
और जब उन्हें माटी का अपनत्व मिला ;
वे वृक्ष बन गए ||
धीरे -धीरे उन् सघन वृक्षों पर पक्षियों ने अपना नीड़ बनाने की कोशिश की
अथक प्रयत्न i ;तिनका -तिनका जोड़ा ;आश्रय बन गए
शाखा -शाखा पर पंछी ही पंछी|
शाम सवेरे पक्षियों के कलरव से वातावरण रमणीय हो गया |
वे गाते एकता ;अखंडता ;भाईचारे का मंगल गान |
पर मानव से नही देखा गया वो एकता ;अखंडता और विश्वास का गान |
उसने भी इसे खत्म करने में लगा दी जी -जान |
''वृक्ष विश्वास की पराकाष्ठा थे कटे नही ''|
मनुष्य विज्ञानं के महत्व को जानता था' ''थके नही '
आरीऔर बड़ी होती गई
अंत में मानव ही जीता
पर पंछी भी हारेनही
वे पंक्ति बद्ध हो कर नील गगन में, उड़ चले ,
कर्मके सहारे नवीन नीडकी तलाश में |
पर जाते -जाते वे कहते गए
----वाह रे मानव वाह
तुम से तुम्हारा जब घर छिना जाएगा
तब हमारी याद आएगी
हम तो सब एक है;एक साथ है ;एक बार और तिनके जोड़ लेंगे
लेकिन तुम लोगो में वो एकता वो प्रेम वो भाईचारा है ही नही जो तुम एक साथ रह सको|
पंछी उड़ते गए ........................

Sunday, 7 June 2009

मेरी अर्जी



दाता
--
धूप दे या छाँव दे,
पथ दे या ठांव दे ,
राहत दे या घाव दे,
मुक्ति दे या तनाव दे,
तेरी मर्ज़ी दाता , ये मेरी अर्जी |

तट दे या बहाव दे,
शीत दे या अलाव दे,
रोक दे या घुमाव दे ,
लगाव दे या अलगाव दे
तेरी मर्ज़ी दाता , ये मेरी अर्जी |
(इमेज सोर्स- कोप्तिच्चुर्च .ओआरजी)

Thursday, 4 June 2009

तुम आओ तो सही

मेरे घर के आँगन में जलता है स्नेह का दीपक
तुम आओ तो सही
मेरे घर के आँगन में संस्कारों की श्री वृंदा लहराती
तुम आओ तो सही
मेरे घर के आँगन में हर्ष की चमेली महकती
तुम आओ तो सही
मेरे घर के आँगन में भावनाओं की चिडिया चहकती
तुम आओ तो सही
मेरे घर के आँगन में , मैं बैठी बाट जोहती
तुम आओ तो सही ......................

Wednesday, 3 June 2009

लक्ष्मी - सरस्वती का आगमन

बात करीब चालीस- बयालीस वर्ष पहले की है | हम जुनी इंदौर में रहते थे जब मै छोटी थी |तब मेरे बाबूजी जब भी बाहर जाते ,कभी भी खालीहाथ घर नही आते ;चाहे वे नोकरी के लिए जाते या मिलने -जुलने | कभी चना -परमल कभी गीली मूंगफली , कभी जवार मक्काकी धानी कभी और कभी फुटाने| मोसमी फल तो पक्का| कभी लड्डूलाल की नमकीन चना दाल या मिक्चर| हाँ ....एक बात और याद आती है, उन दिनों सायकल के हँडलपर सूप में शेवंती की लालगुलाब लगी आठाने वाली वेणी भी लगाने को मिलती |समय बीतता गया मेरे विवाह के बाद वो प्रायःमेरे बच्चो से मिलने आते , पर अब भी खालीहाथ कभी नही| ये सब और न जाने कितनी बाते याद ऐसे आई -की कल टी वी पर एक सज्जन 'घर में लक्ष्मी कैसे आए 'अपने विचार बता रहे थे ;एक महत्वपूर्ण टिप देते हुए कहा --घर का ' मुखिया बाहर से घर में खाली हाथ कभी न आए ;चाहे वो घर के आँगन में लगे पेड़ की पत्ती ही क्यो न हो '|आज बाबूजी तो नही हैं , पर उनके और बाई [माँ] के आशीर्वाद से पुरे परिवार पर लक्ष्मी के साथ-साथ सरस्वती की महती कृपा है |ये माता -पिताके लगाये वृक्ष है , सम्यानंतरसे हम फल पाते हैं| मेरी आँखे ठंडे आंसुओ की धारा से नमन करतीहै|

Tuesday, 2 June 2009

पावस गीत

पावस -गीत
धानी रंग छाया -धानी रंग छाया
बरखा आई ;बूंदे लाइ
देखो मन हर्षाया --
धानीरंग छाया |

कागा के नीड़से देखो ;भागी कोयल ;मीठी बोली
चली गाय कीचड़में देखो ;
तुष्ट हो गई बगुला टोली
भँवरा गुनगुनाया
धानी रंग छाया |

हरी वसुधा हरा-हरा जग
गोरी नाचे चुनर पहन
रसिया देखो आनंदित है
शांत हो गई अंग अगन
मनवा झूमा गाया
धानी रंग छाया|

चीड़ देवदार नीम
अम्बुवा सागवान
अमलतास ,महुवा
पीपल भी नहाया
धानी रंग छाया |

Monday, 1 June 2009

विचार

आज भोर से ही आगये है वो ,
अब दिन भर मेरे साथ रहेंगे वो ,
वो कहते रहे -बैठो फुर्सत में कुछ मीठी बात करे |
छोटी -छोटी बातो का मनमोहक विस्तार करे |
अरे '। छोटे से एक विचार की कड़ी बन गई |
कविता की छोटी श्रंगारित लड़ी बन गई |

जो आकर चले गए


कभी आते हैं चले जाते हैं
कभी आ जाते हैं तो पीछा नही छोड़ते
कभी किसी से मिलते ही नही
मिल जाते हैं तो नया रंग लाते हैं
कभी आए ,मिले ही नही
फिर भी रह गए तो
नीरसता लाते हैं|

कभी आते ही जीवन तक बदल देते हैं
कभी कुछ क्षण में चले जाते हैं
कभी आजीवन साथ रह्रते हैं
कभी न्यूटन जैसी महानता दिला देते हैं
और कभी रावन जैसी बदनामी
कभी मीरा को कृष्णमय
और कभी कृष्ण को राधामय ||

कभी किसी और के पास हों और लेलें
तो कैकेयी बना देते हैं
कभी धर्म के साथ आए ,तो सति अनुसुइया की तरह गोद में बिठा लेते हैं
और कभी इनके रहते महाभारत का रचन
और कभी दसरथ के वचन |

दोस्त यह विचार भी गजब की देन हैं
कर्म करो ,आगे बढ़ो
यह संतों के बैन हैं|